क्या हमें वास्तव में सुख चाहिये ?

चौंकिये मत प्रश्न बिल्कुल सही है। किसी भी व्यक्ति से यह पूछिये कि उसे जीवन में क्या चाहिये तो प्राय: यही उत्तर मिलता है कि मुझे सुख चाहिये। यह सुख भले ही धन के रूप में हो या फिर मान के या फिर शक्ति, सम्पदा, परिवार, व्यापार आदि के रूप में परन्तु मोटे तौर पर माना यही जाता है कि हर व्यक्ति को सुख चाहिये। लेकिन तनिक विचार करके देखें कि क्या हमें वास्तव में सुख चाहिये?

सारा जीवन धन के पीछे भागते हैं किन्तु धन का उपभोग करने के लिये हमारे पास समय नहीं है। कहते हैं कि रोटी कमाने के लिये सारी मेहनत करते हैं परन्तु समय से रोटी नहीं खा पाते, जो रोटी खाते भी हैं उसे पूरी तरह से हजम नहीं कर पाते। यहां तक कि हमारा मान भी लोगों की दया-दृष्टि पर निर्भर है। जीवन में प्राय: न तो हम स्वयं को ही पूर्ण सुखी कर पाते हैं, न परिवार-मित्र और समाज को संतुष्ट कर पाते है। तो फिर हम चाहते क्या हैं? आखिर हम क्यों और किसके लिये जी रहे हैं?

समस्या बहुत ही गम्भीर है लेकिन मूल कारण इतना ही है कि हम कस्तूरी मृग की तरह अपने वास्तविक सुख स्वरूप को भूल गये हैं और माया के जंगल में भटक कर झूठे सुख के रूप में वस्तुत: दु:ख का सेवन कर रहे हैं। जैसे एक कुत्ते को हड्डी में बड़ा रस आता है। वह किसी भी तरह उस हड्डी को छोड़ना नहीं चाहता। लेकिन उस मूर्ख को यह नहीं पता कि सूखी हड्डी में तो कोई रस ही नहीं है बल्कि सूखी-सख़्त हड्डी को चबाने से उसके अपने जबड़े ही घायल हो रहे हैं और उनसे निकल रहे खून को वह मीठा रस समझ कर पान कर रहा है। इसी प्रकार हम भौतिक सुख-सुविधाओं में सुख तलाशने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनमें यदि कोई सुख हो तो ही मिलेगा। किसी वस्तु की प्राप्ति होने से या किसी इच्छा की पूर्ति होने से जब मन थोड़ा शान्त होता है तो स्वाभाविक ही चेतना अन्दर की ओर गति करती है और हमें सुख की प्राप्ति होती है। किन्तु हम अन्दर से मिले उस सुख को उस वस्तु या उपलब्धि से जोड़कर उनके पीछे भागना शुरू कर देते हैं। समस्या तब ज्यादा बढ़ जाती है जब इस बाहर की दौड़ में हम भीतर से टूटने लगते हैं। तब हमें उन वस्तुओं में भी आनन्द नहीं आता। आज सारी दुनिया में जितना अधिक भौतिक संसाधनों की भरमार है, उसी अनुपात में बल्कि उससे भी अधिक मानसिक तनाव और रोगों की भी वृद्धि हुई है।

दुनिया का व्यापार ही कुछ इस तरह का है कि हमें घर, स्कूल, कालेज हर जगह पर बाहरी उपलब्धियों और वस्तुओं के विषय में ही ज्ञान और साधन प्राप्त होते हैं। भीतर स्थित आनन्द के स्रोत से सीधा सम्बन्ध न जोड़ पाने के कारण हम सदा ही अन्य वस्तुओं या व्यक्तियों में सुख की खोज करते हैं। हम कभी सोच ही नहीं पाते कि हमारा सुख किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति का गुलाम नहीं है बल्कि सुख का स्रोत तो हमारे ही भीतर है। बाहर की परिस्थितियां तथा साधन मात्र उस आन्तरिक स्रोत से मेल कराने में ही सहायक होते हैं। इस तथ्य को समझने के लिये एक दृष्टान्त लेते हैं।

एक बार एक सज्जन का जवान बेटा कारोबार के सिलसिले में जहाज से विदेश जाने के लिये तैयार हुआ। अधिक लाभ होने की आशा से सभी परिवारजन अत्यन्त प्रसन्न थे। बूढ़े मां-बाप ने स्वयं आशीर्वाद देकर बेटे को विदा किया। अभी कुछ ही दिन बीते थे कि एक तार आया, जिस जहाज में उनका बेटा सवार था वह रास्ते में क्षतिग्रस्त हो गया और किसी के बचने की सूचना नहीं है। तार पढ़ते ही मानो बूढ़े मां-बाप पर तो पहाड़ टूट पड़ा। पिता का तो दिल ही बैठ गया। घर में कोहराम मच गया। रो-रो कर सबका बुरा हाल हो गया। खाना-पीना ही नहीं सोना भी हराम हो गया। दिन बीता, रात भी निकल गई पर किसी ने मुंह में एक तिनका भी न डाला, एक पल के लिये भी आंखें नहीं झपकीं। सब ओर मातम छाया हुआ था। अगले ही दिन एक और तार आया कि जहाज जरूर डूब गया लेकिन उनका बेटा पिछले पड़ाव पर ही उतर गया था और वह सही सलामत है। अब क्या था, चारों ओर खुशियां बिखर गयीं। पिता भी खबर सुनकर उठ बैठे और हंसने-बोलने लगे। मिठाईयां मंगवाई गयीं, उत्सव का सा महौल बन गया।

विचार करने की बात है कि बाहर की दुनिया में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ फिर भला ऐसा क्या हो गया कि पहले वह सब दु:ख के सागर में डूब गये और फिर अचानक सुख के आसमान में उड़ने लगे। पहला तार पढ़कर उनके मन में तूफान उठ खड़ा हुआ, प्राणों की धारा बेटे की याद के बहाने से बाहर की ओर पूरे वेग से गतिशील हो गयी और रोना-पीटना शुरू हो गया। जबकि दूसरा तार मिलते ही प्राणों का बहिर्मुखी वेग शान्त हो गया, मन एकदम ठहर गया और जैसे ठहरे हुये जल में प्रतिबिम्ब साफ नजर आता है उसी प्रकार उस ठहरे हुये मन में अपने सुख स्वरूप की झलक प्राप्त हो गई। याद करें उपनिषद् वाणी, जो कहती है- ‘अयमात्मा ब्रह्म’ और खोज करें उस सच्चे सुख की। शुभस्य शीघ्रम्।

प्रभु चरण चंचरीक – स्वामी सूर्येन्दु पुरी