जीवन की डोर

कभी आपने आसमान में उड़ती पतंगों को देखा है? रंग-बिरंगी, छोटी-बड़ी, तरह-तरह की पतंगें आसमान में ऊपर-नीचे, दांये-बायें उड़ती फिरती हैं। एक बार ऐसे ही आसमान में उड़ रही एक पतंग ने देखा कि वह धरती से बहुत ऊपर आ गयी है। वहाँ से देखने पर नीचे सभी कुछ बहुत छोटा-छोटा नजर आ रहा था। हाथ की ढील पाकर दूसरी पतंगों को पीछे छोड़कर वह आसमान में और आगे बढ़ने लगी। उसे इतना ऊपर आकर बड़ा अच्छा लग रहा था। वह अपने आप को बहुत बड़ा और ऊँचा महसूस कर रही थी। अचानक एक झटका लगा और उसे कसाव सा महसूस हुआ, उसकी आगे की गति रुक गई और वह वहीं चक्कर खाने लगी। उसके सपने को ठेस लगी, उसे होश आया कि वह एक डोर से बंधी हुई है जिसके खिंचाव के कारण उसकी प्रगति रुक गई है। उसे बड़ा गुस्सा आया, वह चिढ़कर डोर को बुरा-भला कहने लगी कि तुम्हारे कारण मेरी प्रगति रुक गई है।

डोर ने प्यार से कहा, ‘अरे पगली, इतना मत इतरा। मेरे ही बल पर तो तू आसमान में उड़ी फिरती है। गुस्से मत हो, मुझे पकड़ने वाले हाथों को पता है कि कहाँ तक जाना तेरे लिये सुरक्षित है। वही तो तुझे ढील देकर आगे बढ़ाता है और थोड़ा कसके दायें-बायें चलाता है। उस पर विश्वास रख, उसे पता है कि तेरे लिये क्या सही है और क्या गलत। उसी ने तो तुझे यहाँ तक पहुंचाया है, वह तो चाहता ही है कि तू खूब ऊपर तक उड़े।’

लेकिन पतंग ने उसकी बात सुनी-अनसुनी कर दी। वह क्रोध में भरी हुई मौका ढूंढने लगी डोर से अलग होने का। बहती हवा का सहारा लेकर वह दूसरी पतंगों की डोर से टकराने का प्रयास करने लगी और आखिर वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, डोर कट गयी और कटी पतंग हवा में लहराने लगी। लेकिन यह क्या, पतंग के तो होश उड़ गये, वह तो हिचकोले खाते हुये नीचे की ओर उतरने लगी। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो गया, दिशा और गति पर कोई नियन्त्रण नहीं, हवा के धक्के उसे इधर-उधर झटका देते हुये नीचे की ओर ले चले। नीचे धरती पर पहुँचने से पहले ही वह एक पेड़ पर अटक सी गई, उसकी जान में थोड़ी सी जान आयी लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। हवा के धक्कों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और वह एक डाल से दूसरी पर, इस प्रकार टकराते ठोकरें खाते, तार-तार होकर धरती पर आ गिरी।

हमारा जीवन भी तो कुछ-कुछ ऐसा ही है। प्रभु के मजबूत हाथों से जुड़ी कृपा रूपी डोर हमें जगमाया के आकाश में आगे से आगे सफलता के कई मुकाम दिखाती है, सुख-सुविधा के नाना साधन हमें उपलब्ध कराती है, कर्म करने की शक्ति, निर्णय लेने की बुद्धि, परिस्थितियों का सामना करने की युक्ति तथा धैर्य सभी कुछ वही तो हमें देती है। शरीर के भीतर स्थित परमात्मी शक्ति श्वासों की डोर से हमें बांध कर रखती है। सुख और दु:ख रूपी झटकों के साथ दायें-बायें संघर्षमयी गति कराती हुई यह जीवन डोर हमारी चेतना का विकास करती हुई हमें आगे बढ़ाती है। किन्तु धीरे-धीरे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पांच विषयों के आकर्षण में पड़कर हमारी प्राणों की धारा बहिर्मुखी होती जाती है और भीतर से सम्बन्ध टूटता जाता है। धन-मान की दौड़ में भागते-भागते हम भीतर बैठे परमात्मा को भूल ही जाते हैं और जागतिक पदार्थों और सम्बन्धों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। तब राग-द्वेष और काम-क्रोधादि की हवा हमें रोगों और दु:खों के थपेड़ों में उलझा देती है, चित्त चंचल और अशान्त होता जाता है। आखिरकार यह शरीर रूपी पतंग तार-तार होकर काल रूपी धरती में समा जाती है।

पर घबरायें नहीं, अभी समय है। जब तक श्वास है तब तक आस है। यह जान लें कि कर्म में तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिये अपने उत्तरदायित्त्वों का निर्वाह तो करना ही है पर साथ में कुछ समय उस परमात्मा से, अपनी अन्तरात्मा से सम्बन्ध जोड़ने के लिये भी निकालें जिसके हाथों में हमारे जीवन की डोर है। दुनिया की अंधी दौड़ में कहीं हम अपनी जीवन डोर से अलग न हो जायें इसलिये परमात्मा के मंदिर रूपी इस शरीर को सदा ही स्वस्थ और शक्तिसम्पन्न बनाने का यत्न करें तथा मन एवं प्राण, जो उससे सम्बन्ध जोड़ने का साधन हैं उन्हें भी शान्त, शुद्ध एवं सशक्त बनाने की युक्ति करें। इस सबके लिये परमात्माम के सेवक बनकर दुनया के व्य वहार करते हुये उसका निरन्तसर ध्यांन धरें और जितना समय मिले उसकी आराधना अवश्यव करें। शुभस्य शीघ्रम्।

प्रभु चरण चंचरीक – स्वामी सूर्येन्दु पुरी