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Surya

Siddhamrit Surya Kriya Yoga (SSKYoga) emerged with a huge bang on the scene. Its inventor, Swami Buddh Puri Ji is confident that through it the age-old Gordian knot on the path of Mahayoga can be opened. Using it, it is actually possible for the Divine Consciousness to manifest itself clearly in the body of the practitioner, such that the body too becomes Divine. Such a body, as a side-story would not die, just like Swami Ramalingam’s was.

However, keeping apart those lofty goals SSKYoga has much to offer for a beginner too. Starting from a very accessible level, easy enough to be performed by a child or a great grandfather, it utilizes the life-giving rays of the sun to bring total health to the body and mind of the practitioner. Numerous cases affirming this statement have been registered.

In this Handbook to Siddhamrit Surya Kriya Yoga, you will read about the basic philosophy behind the practice; a detailed look at level 1 of this practice. For SSKYoga practitioners, the section on Frequently Asked Questions would be very useful too. A must-read for anyone exploring avenues for greater health, joy, light, and bliss in everyday life.

सिद्धामृत सूर्य क्रियायोग सूर्य जीवन का आधार है, यह एक अटल सत्य है, जिसे धर्मशास्त्र ही नहीं विज्ञान भी मानता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने सामान्य रोगों में ही नहीं वरन् कैंसर, ओस्टियोपोरोसिस, मल्टीपल स्क्लैरोसिस, पक्षाघात एवं हृदय रोग जैसी अनेक जटिल समस्याओं तथा डिप्रेशन आदि मनोरोगों में भी सूर्य किरणों के द्वारा उपचार करने में सफलता प्राप्त की है। आरोग्य के साथ ध्यान-साधना का आधार भी सनातन परम्परा में सूर्य को माना गया है।

सूर्य के जितने भी लाभ गिनाये जायें कम हैं, किन्तु सूर्यकिरणों के सेवन की सही विधि ज्ञात न होने के कारण सामान्यजन लाभ के स्थान पर हानि अधिक उठाते हैं। सूर्य–स्नान, सूर्यत्राटक, सूर्यनमस्कार, सूर्य अर्घ्य आदि अनेकानेक विधियाँ भी एक सीमा में ही लाभप्रद हैं।

‘सिद्धामृत सूर्य–क्रियायोग’ एक ऐसी सरल, शास्त्रसम्मत तथा वैज्ञानिक विधि है, जिसके द्वारा सूर्य की अमृतरश्मियों का पान करते हुए केवल रोग और बुढ़ापा ही नहीं बल्कि भूख–प्यास जैसी सीमाओं को भी पार करना संभव है। गृहस्थ हो या संन्यासी, आस्तिक हो या नास्तिक, बच्चा हो या बूढ़ा, रोगी हो या योगी, यहाँ तक कि मृत्युशैय्या पर पड़ा व्यक्ति भी इस साधना से लाभ उठा सकता है। जो जहाँ पर है, उसको वहीं से आगे बढ़ने का मार्ग मिल जाता है। रोगी को स्वास्थ्य, विद्यार्थी को मस्तिष्क की तीक्ष्णता, गृहस्थ को वीर्यशक्ति और ऊर्जा तथा साधक को अन्तर्मुखता प्राप्त होती है।

यह पुस्तक प्राचीन सिद्धान्तों, नवीन प्रयोगों, सूर्य से रोग निवारण की प्रक्रिया तथा साधना विधि की कुंजी है। अब तक एक लाख से अधिक लोगों के जीवन में प्रविष्ट यह अनुभव–धारा अनवरत प्रगतिशील है। आप भी विलक्षण सूर्य साधना की इस प्रथम पुस्तक को पढ़ें और लाभ उठायें।


 

Sanjeevani

Sanjivani Kriya (Esoteric Science of Pranayama) – This book discusses the 1st level of Sanjivani Kriya that revitalizes our body & revivify our mind by upgrading our normal breathing into complete yogic breath. As we progress, pranayama happens in every breath that keeps us connected with the source of life, all the time.

संजीवनी क्रिया (प्राणायाम का प्रामाणिक विज्ञान) – यह तो सभी जानते हैं कि श्वास है तो जीवन है और इसीलिये योग का प्रचार होने के बाद घर-घर में प्राणायाम शुरू हो गया, लेकिन अनेक लोगों को इससे लाभ होने के स्थान पर कष्ट हो गया, कुछ तो रोगी भी हो गये। आश्चर्य है कि अनेक प्राणायाम कराने वाले भी रोगी और स्थूलकाय बने हुये हैं, जबकि प्राणायाम का लक्षण ही है, शरीर का हल्का और स्फूर्तिवान होना। कारणµ श्वास के विज्ञान का पता न होना। संजीवनी क्रिया हमें उस विज्ञान से परिचित कराती है और अत्यन्त सहज ढंग से, जिसे बच्चा-बूढ़ा-रोगी कोई भी कर सकता है, हमें अपने शरीर में प्राण का संचार करना सिखाती है। इसके साथ-साथ बैठने, खड़े होने, चलने आदि का सही तरीका तथा आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को स्वस्थ रखने वाली अनेक सूक्ष्म क्रियायें सिखाती है।

यह मात्रा आश्चर्य ही नहीं दु:ख की भी बात है कि लोग जीवन की समस्त  क्रियाकलापों के आधारभूत श्वास विज्ञान के बारे में शिक्षा प्राप्त करने का  तनिक भी प्रयास नहीं करते और अनजाने ही जीवनपर्यन्त अधूरा तथा  मृत्युग्रसित श्वास लेते रहते हैं। यह पुस्तक इस दिशा में प्रथम प्रामाणिक  प्रयास है जो लेखक की 40 वर्षों की साधना और लाखों लोगों पर किये गये  प्रायोगिक अनुभवों पर आधारित है।


 

Agni Hindi

अग्नि क्रिया योग (यज्ञ से कुण्डलिनी जागरण) प्राचीन समयों में परमपद सच्चिदानन्द परमात्मा की प्राप्ति हेतु दो ही मुख्य साधनाओं का प्रचलन रहा है। यह दो साधनायें हैं- बहुप्रचलित (1) सूर्य साधना, तथा (2) अग्नि साधना। सूर्य साधना ही ऋषि अनुमोदित ‘सन्‍ध्‍या’ है तथा अग्नि साधना को ही ‘यज्ञ’ अथवा ‘अग्निहोत्र’ का नाम दिया जाता रहा है। यद्यपि सन्‍ध्‍या और यज्ञ का प्रचलन अब भी है, किन्तु् जब तक अग्नि के साथ यज्ञकर्ता का सम्बन्ध‍ नहीं होता, तब तक अग्निहोत्र अथवा यज्ञक्रिया केवल शुष्क कर्मकाण्ड बनी रहकर निष्प्र्भावी ही रहती है। यदि अग्नि के सम्मुख बैठकर भी अग्निदेव के साथ आहुति डालने वालों का सम्बन्ध न हो और ऐसा करने पर भी वह ऋषियों के समान तेजस्वी और वेदज्ञ बनना चाहे तथा सोचे कि उसके तेज के सामने मृत्यु भी भयभीत हो, तो यह कैसे सम्भव हैॽ

पुरातन ऋषियों ने अग्निदेव के साथ सम्बन्ध  स्थापित करने के लिये पहले कुण्ड में अग्नि प्रचण्ड करके उस अग्नि के साथ नाता जोड़ा, जिससे उनका शरीरस्थ सुषुम्ना पथ अग्निमय हो उठा। तदनन्तर इस पथ पर अग्रसर होते हुये उन्होंने परमदेव परमात्मा की प्राप्ति की, क्योंकि सम्पूर्ण अग्नियों का भी अग्नि ही तो परमदेव है। अग्निदेव के साथ सम्बन्ध‍ जोड़ने की क्रिया का नाम है ‘अग्नि क्रिया योग’। पुरातन ऋषियों ने इसी अग्नि क्रिया योग के द्वारा अपने आप को अग्निमय बनाकर अग्निदेव के माध्यम से ब्रह्माण्ड व्यापिनी समस्त दैवी शक्तियों से सम्बन्ध स्थापित किया। अपरिमित शक्ति अर्जित करके प्रकृति को विश्व कल्याण कार्यों में प्रयुक्त करने की साधनायें कीं, पारलौकिक तथा लौकिक सब प्रकार की समृद्धता प्राप्त की। इसी अग्नि क्रिया योग की चर्चा इस पुस्तक में की गई है।


 

KAS

कुण्ड अग्नि शिखा  यह त्रैमासिक पत्रिका, हिन्दी व पंजाबी में अक्टूबर 2001 से लगातार प्रकाशित हो रही है, जिसमें विशेष रूप से स्वयं गुरुदेव स्वामी बुद्धपुरी जी महाराज द्वारा महायोगमयी साधना सम्बन्धी गम्भीर रहस्यों को सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। सिद्ध सन्तों के साधनामयी जीवन की चर्चा के अलावा सफल जीवन जीने के तरीके, प्रेरणादायक बोध कथायें और साधकों की जिज्ञासाओं के समाधान भी इसमें दिये जाते हैं। स्वामीजी द्वारा रचित जपुजी साहिब की व्याख्या भी इसमें प्रकाशित होती है। इसकी सदस्यता 15 वर्ष (र० 1100), 6 वर्ष (र० 500), 3 वर्ष (र० 250), 1 वर्ष (र० 100) है।


 

SMT (1300 x 750)

An Ultimate & Rare Creation – Human Body (Arena of God’s play)

The whole creation is manifested in the so called mortal physical human form- the body- measuring just a few feet. This manifestation is unique in its own way- obvious, but concealed. Exploration of the esoteric secrets of human form, is the simplest path for exploration of the universe, and beyond. The Mahasadhana of permeating even the grossness and mortality with the nectar of blissful consciousness, is possible only in the human body. This book is a treasure of guidance for the sincere seekers, desirous of venturing on to the supreme path of this most exalted Mahasadhana.

सुदुर्लभ मानव तन (हिन्दी व पंजाबी)  साढ़े तीन हाथ के मानव पिण्ड में, गुप्त-प्रकट रूप में सारा ब्रह्माण्ड ही समाया हुआ है। यदि ब्रह्माण्ड के रहस्यों की खोज करनी है तो मानव पिण्ड के रहस्यों की खोज ही सीधा पथ है। दुर्लभ मानव तन को, परमेश्वरी महाशक्ति की क्रीड़ास्थली बनाकर, मर्त्यलोक को ही सत्यलोक, आनन्दधाम में रूपान्तरित करने की महासाधना के इस संक्षिप्त विवरण से जिज्ञासु सुधीजन स्वानुभव-आधारित क्रमानुसार-वर्णित मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।


 

Bon Apetite

Bon Appetite (Food for Spiritual Evolution) – Man is not a social animal; he is the very salt of divinity. Within man resides secrets galore, waiting to explode. In the ascent of man to a better, higher form, the food that he eats plays a crucial role. Apart from presenting the art, science & philosophy of food, this book asks a central question: Must man switch to a 100% meat free diet? Of Course!


 

Akal Path

अकाल पथ (हिन्दी व पंजाबी) सुषुम्ना का राजपथ ही दशमद्वार से होकर ब्रह्मलोक तक की यात्र तय करवाता है। इस लघु पुस्तिका में उस पथ का सूक्ष्म वर्णन तथा उसके अनुसन्धान की विधि का अत्यन्त सरस विवेचन है।


 

Bodh K
बोध कथाएं कथा-कहानियाँ मात्र बाल-मनोरंजन का साधन नहीं वरन चरित्र निर्माण का आधार हैं। इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए ऋषि-मुनियों ने परमात्मा तत्व विषयक गूढ वेद ज्ञान को सरस एवं सरल पुराण कथाओं के रूप में जन सामान्य में प्रचारित किया। मन तथा बुधि से परे के परमात्म तत्व को सीधा ग्रहण करना हमारी स्थूल सीमित बुधि के लिये सम्भव नहीं है। कथाओं में इन्द्रिय गम्य घटनाओं तथा दृष्टांतों का सहारा लेकर उस इन्द्रियातीत अनिर्वचनीय तत्व को दार्ष्टांत रूप में धारण करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार कथाएं बोध जागृत करने का प्रबल साधन बन जाती हैं।

शब्द सुरति संगम आश्रम से प्रकाशित त्रैमासिक आध्यात्मिक पत्रिका ‘कुण्ड अग्नि शिखा’ में निरंतर ऐसी कथाओं का प्रकाशन होता है। उन्हीं में से चुनी हुई 51 कथाओं का यहाँ संकलन निज बोध के जागरण की प्रेरणा रूप में आप सबके समक्ष इस पुस्तक में प्रस्तुत है।


 

Amritanubhav

अमृतानुभव महायोगी स्वामी बुद्धपुरी जी के जपयज्ञ सम्बन्धी प्रवचनों का यह अनमोल संग्रह किसी भी जिज्ञासु के लिये महान मार्गदर्शन है। नाम की महिमा, नामजप द्वारा शक्तिजागरण और जाप की विभिन्न विधियों तथा स्तरों का गूढ़ विवेचन, युक्तियों और शास्त्र प्रमाणों के साथ अनुभवपूर्ण इतनी सरल भाषा में दिया गया है कि कोई भी साधक सहज ही प्रेरणा और मार्गदर्शन ले सकता है।


 

Sri Kambli wale

गुरुदेव चरितावली सन्तों का चरित्र सदा ही भक्तों को सन्मार्ग पर चलाने में सहायक होता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वामी दयालुपुरी जी द्वारा अत्यन्त मनोहारी भाषा एवं अलंकारिक शैली में रचित प्रभु कम्बलीवाले का जीवन चरित प्रस्तुत किया गया। कालान्तर में उनके परम भक्त डा- लक्ष्मणदास सद्दी ‘पिताजी’ द्वारा परम वेदज्ञ स्वामी दयालुपुरी जी का जीवन चरित भी (दो भागों में) श्री गुरुदेव चरितावली नाम से प्रकाशित हुआ।


 

Dera Harisar